बांधे हुए है हाथ ,वो चौखट पर एक सोच में डूबा , जो ,मस्ती में खड़ा है ! है उलझन बसी बातो में उसकी , क्युकी सपना जो बड़ा है ! रोज़ है वो ढूंढ़ता , अपने आप को ही यूँ , जैसे वो कोई मोती ,दरिया में दूर का ! देखा है उसने भी हर दौर को करीब से ! बस दौड़ता सा अब वो कही , खुद है थक गया ! लौटा ना , अब वो पायेगा ,खुद का ही ये समय ! जो बीत क़र मज़ाक सा ,उसपर था हंस रहा ! ..................।