बांधे हुए है हाथ ,वो चौखट पर एक सोच में डूबा ,

जो  ,मस्ती में खड़ा है ! है उलझन बसी बातो में उसकी ,

क्युकी  सपना जो  बड़ा है !

रोज़ है वो ढूंढ़ता ,  अपने आप को ही यूँ ,

जैसे वो कोई मोती ,दरिया में दूर का ! 

देखा है उसने भी हर दौर को करीब से !

बस दौड़ता सा अब वो कही , खुद है थक गया !

लौटा ना , अब वो पायेगा ,खुद का ही ये  समय !

जो बीत क़र मज़ाक सा ,उसपर था हंस रहा ! 

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